मैं बिखरा, टूटा ,
अपनी शाखों से ,
एक वृहद वृक्ष का टुकड़ा ,
उड़ता हुआ यहाँ वहाँ ,
खोज में नयी जड़ों की ,
नयी जमीं की ,
अब भी याद है वो बड़ा सा पेड़ ,
जिसकी छाया में कितने ही रहते थे ,
वो बड़ा सा पेड़ जिसकी जड़ें गहराई में अनंत फैली हुई ,
जिसने देखे जाने कितने सावन और पतझड़ ,
सुख और दुख ,
मैंने भी देखा सब कुछ ,
औ फिर जाने कैसे टूट गया ,
अपने अपनों से छूट गया ,
झूटे सपनों में डूबा ,कभी ऊपर ,
कभी नीचे ,कभी आगे ,
कभी पीछे ,कहाँ मिला अपना जहां अब तक ,
नहीं मालूम ,
मेरी हस्ती का नहीं अता पता ,
कि मैं एक बीज , फल ,या फूल ,या पंखुड़ी ,या एक पत्ता शाख से टूटा हुआ ,
सूखा, बेजान ,बेउम्मीद ,यहाँ वहाँ भटकता हुआ ,
बिना किसी अंत के ,अपने आरंभ को याद करके इतराता हुआ ,
और अंत के लिए असंभाव्य ,अंजान ,
उम्मीद के साथ कि एक दिन जुड़ जाऊंगा ,जहां से टूटा था ,
अपनी मिट्टी से , अपने बरगद से ,मैं एक टुकड़ा ,अपने वृहद वृक्ष का .....................................
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