कब तक भटकेगी अतृप्त
पेट के खाली गलियारों में भूख
आँखों में वो आ बैठती है
आलथी-पालथी मारकर बैठी वो भूख
मरती फिर भी नहीं है
अन्तिम साँसों तक प्रतीक्षा करती है
एक निवाले का
भूखी आँखें कुछ नहीं देख पाती हैं
पर जूठे पत्तलों में भी तलाशती हैं भोजन
भूखे कान भी अक्सर बहरे होते हैं
पर खाली पेट में करवटें लेती उर्मीयों की
घुटी-घुटी चीखें साफ-साफ सुनते हैं
कहीं भूख से शुष्क हुई जीभ लार को
को तरसती रहती है
तो कहीं
गर्म साँसों में से
रोटी की खुशबू छानने की कोशिश में
लगे रहते हैं दो भूखे नथुने
बहुत सी आँखें भूखी ही सो जाती हैं
कुछ रूठी हुई और कुछ थकी हुई
रात भर मगर उँघता रहता है भोजन
कुछ छोटी-छोटी आँखें भी सो जाती हैं भूखी
या फिर सुला दी जाती हैं
सुनाकर कहानी चन्दा मामा की
जो उन नन्हीं आँखों को
बिल्कुल रोटी जैसा लगता है
खेतों से मंडियों तक,
मंडियों से दुकानों तक, दुकानों से घरों तक
अनाज घूमता है
चूहों से और दलालों से कुतरा अनाज
घूमता है
कुछ लोग मगर इस चक्र से
बाहर ही रह जाते हैं
एक जिंदा मुहावरा अक्सर कहता है
भूख मर गई
पर जो सचमुच भूखे हैं
क्या वो यकीन करेंगे?