Wednesday, March 26, 2014

मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................

मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................
रिश्तों का एक दरख्त ,बड़ा पुराना ,
सींचा हुआ खून और पसीने से ,
जाने क्या हुआ ,कैसे लगी बुरी सी नजर इस पर ,
की हर पत्ती टूटके डली है जमी पे ,
और शाख ठूंठ से सीधे खड़े हैं ,
सर उठाए ,कोशिश लाख कि फिर जी जाये ये ,
अकेला लड़ूँ कैसे ,अब जीना मुश्किल ,
और ढहते देखना अपनी बगिया के पेड़ को ,
सोचता हूँ ,मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................


दरख्त की हर शाख अब सूखी सूखी सी ,
हर पत्ता टूटके झरने को बेकरार ,
जड़ें कमजोर और मैं अकेली पत्ती ,
जूझती ,झुंझलाती ,द्वंद्व में फंसी हुई ,
जुड़ा रहूँ ,की छोड़ दूँ ,कैसे सब कुछ अच्छे की ओर मोड दूँ ,
पर बीमारी इतनी कि ,मुश्किल सा है ,
बच पाना मेरे दरख्त का ,
साथ खत्म होने का इंतेजार ,
या दरख्त को गिरता देखूँ ,
सोचता हूँ ,मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................


बस वो ही था ,जिसने दिखाये मौसम ,
पतझड़ ,सावन ,बसंत और बहार ,
बस वो ही था जो हिमालय सा खड़ा ,
हर समय सबको छाव देता था ,
आशियाने थे कितने परिंदों के उस पर ,
सब आए गए, हो गए ,
जब हरा था तो कितने राहगीर रुके इसके नीचे ,
पर अब अंत है इसका ,सब सूख गया है ,
पानी भी ,न लहू इसमें ,ये खाक में मिल जाएगा इक दिन ,
सोचता हूँ उम्मीद के सहारे रुक जाऊन थोड़ा सा ,
पर कभी सोचता हूँ ,मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................


उम्मीद लगाना मुश्किल ,
उम्मीद देना झूठ और प्रपंच सा ,
रोज उठता था तो वो सूरज इस दरख्त के चक्कर काटा करता था ,
कई बादल समंदर से उड़कर आते ,
और बरसकर के चले जाते ,नाचा करता था में भी हवा के झोंकों में ,
अब जलाता है सूरज हर रोज और भी ज्यादा ,
हवा के झोंके भी झकझोर के रख देते हैं ,
बारिश ने भी रुख मोड लिया अब ,कि लगता है डुबो के जान ले लेगी,
इतना दिन साथ दिया हमने एक दूजे का ,
सुख में संग तो दुख में भी ,

या फिर

सोचता हूँ ,मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................

दो भगवान __________

वो प्यारी थी माँ बाप की ,
भगवान को मनाते फिरते थे उसकी लंबी उम्र औ उसकी खुशहाली के लिए ...
उसे पुचकारते थे ,उसे सहलाते थे ,
उसे फूल सा सहेजा करते थे ,जो गलत राह पे चल दे तो बिछा देते थे खुद को की उसे कुछ ना हो 
,वो हँसती तो खुश होते और वो रोती तो रो लेते ...
बस दुआ करते थे कि सब भला हो इस नन्ही सी परी का ,
जाने कितनी बार उसे रोका ,सम्हाला ,गिरने से बचाया ,
पापा ने कंधे पे घुमाया ,माँ ने कोख में पाला ,भाई समझाता रहा सिखाता रहा ,
जाने कब बड़ी हो गई ,समझदार ,खुद के निर्णय लेने वाली,
अब भी भगवान से उसकी खुश किस्मत की अनंत प्रार्थनाएँ की ,
बहुत समझाया कि राह गलत है ,
बस दर्द ही दर्द है ,
कांटे हैं इस रास्ते पे ,
विरह के रास्ते , 
खुद से सब से ,
ना सम्मान है इस निर्णय में ,
ना माँ बाप की खुशी ,
ना परिवार का साथ , 
वो चल पड़ी अलग से रास्ते पे ,अंधेरे से ,ऊबड़ खाबड़ ,अंजान रस्ते की तरफ ,
अपने भगवान को ठेंगा दिखा गई ,
छोड़ गई सबको पीछे रोता हुआ ,सिसकता हुआ ,
बिना बताए जाने क्यूँ ,बोली जी गई मैं ,
क्यूंकी उसके भगवान ने उसकी मुराद जो पूरी कर दी थी ,
जाने कैसे उसका भगवान ,
माँ बाप के भगवान से धोखा कर गया ,
मन्नतों में कलह हो गयी ,
दुआएं लड़ गई एक दूजे से ,
कि जाते जाते ,
वो जी गई ,
सबके लिए मर गई ,
कुछ सपने जी गए और बाकी 
सब उसके लिए मर गए ...................................

मैं एक टुकड़ा ,अपने वृहद वृक्ष का

मैं बिखरा, टूटा ,
अपनी शाखों से ,
एक वृहद वृक्ष का टुकड़ा ,
उड़ता हुआ यहाँ वहाँ ,
खोज में नयी जड़ों की ,
नयी जमीं की ,
अब भी याद है वो बड़ा सा पेड़ ,
जिसकी छाया में कितने ही रहते थे ,
वो बड़ा सा पेड़ जिसकी जड़ें गहराई में अनंत फैली हुई ,
जिसने देखे जाने कितने सावन और पतझड़ ,
सुख और दुख ,
मैंने भी देखा सब कुछ ,
औ फिर जाने कैसे टूट गया ,
अपने अपनों से छूट गया ,
झूटे सपनों में डूबा ,कभी ऊपर ,
कभी नीचे ,कभी आगे ,
कभी पीछे ,कहाँ मिला अपना जहां अब तक ,
नहीं मालूम ,
मेरी हस्ती का नहीं अता पता ,
कि मैं एक बीज , फल ,या फूल ,या पंखुड़ी ,या एक पत्ता शाख से टूटा हुआ ,
सूखा, बेजान ,बेउम्मीद ,यहाँ वहाँ भटकता हुआ ,
बिना किसी अंत के ,अपने आरंभ को याद करके इतराता हुआ ,
और अंत के लिए असंभाव्य ,अंजान ,
उम्मीद के साथ कि एक दिन जुड़ जाऊंगा ,जहां से टूटा था ,
अपनी मिट्टी से , अपने बरगद से ,मैं एक टुकड़ा ,अपने वृहद वृक्ष का .....................................

मैं चला

मैं चला

ये चाहत कुछ कर गुजरने की ,ये सब पा लेने की तमन्ना ,
ये उम्मीद अपना मक़ाम पाने की ,और कोशिश की पूरा हो मेरा हर सपना ,
मालूम ना था ,इतनी दूर लेजाके छोड़ेगी मुझे ,
की जलूँगा सूरज की तरहा ,ऊंचाइयों पे तनहा अकेला ,
जलता हुआ ,खुद से ,खुद के साथ ,
...बेउम्मीद ,बेसहारा ,खुद को जलाके ,रौशनी सबको देता हुआ ,
बस इक सवाल के साथ ,
कोई मेरे पास आये तो कैसे आये ,और में किसी के पास जाऊं तो कैसे ?

क्यूँ

क्यूँ तेरी तलाश करना खत्म नहीं होता ,
क्यूँ तेरी याद में रोना बंद नहीं होता ,
क्यूँ ये उम्मीद के साए हटते नहीं दिल से ,
क्यूँ ये दिल खुद को फिर से नहीं खोता ,
क्यूँ ये आँखें तेरे ख्वाब संजोती हैं ,
क्यूँ ये साँसे तेरे नाम को सुन के चुप पड़ जाती हैं ,
क्यूँ तुझे पाने की तमन्ना मेरे दिल को यूं ही पिघलाती है ,
क्यूँ तेरी याद हमेशा मुझको यू ही तडपाती है ,
क्यूँ हर रात मुझे ये अकेलापन खाता है ,
क्यूँ यह दिल तेरे नाम पे मुझको यूं ही भरमाता है,
क्यूँ हर सुबह तरसती है मेरी ,
और अधूरा सा मेरा दिन ढल जाता है ,
क्यूँ हर दिन तेरी याद के साथ ये चाँद मुझे भटकाता है ,
और क्यूँ मुझको ये अकेलापन ही भाता है ,
क्यूँ खुद से बातें करता हूँ ,
और क्यूँ झूंटी उम्मीद के पीछे ,यह दिल मुझको भटकाता है ,
यह जान के भी की नहीं है तू आस पास ,
न मिल सकेगा इस जहान में दोबारा मुझको ,
क्यूँ मेरा पागल सा मन ,
जब भी हो अकेला ,उदास ,गुमसुम ,
मुझको समझाता है ,बहलाता है ,
की तुम पहले और आखिरी थे ,
ना मिल सकोगे फिर कहीं ,
मान के यूं ही रुकना वाजिब नहीं ,
इसलिए यूं ही तेरी तलाश में दिल भटकता जाता है ,
क्यूंकि किसी दिन हो सकता है ,
अहसास हो तुझे ,मेरी उम्मीद और मोहब्बत का ,
मेरी चाहत ,और बेबसी का ,
जो आज भी तेरी याद के साथ ,
ये जिए जाता है ,दर्द के घूँट पिए जाता है ,
तू ना सही ,तेरी याद ही सही ,
हर धड़कन और अपनी हर सांस तेरे नाम किये जाता है !

खता

कि हर लम्हा हम पूंछते रहे खुद से ;
हर कोई बस हमें ही क्यूँ दगा देता है ;
ढूंडा जवाब हर जगह ;पूंछा हर किसी से ;
कुछ पता ना चला हमें कभी ;
और जब अकेले होते हैं ;खुद से बातें करते हैं ;
और मै मुझके बताता हूँ ;
कि मिलके रहना भी बड़ी खता है ;
दोस्त बनाना भी बड़ी खता है ;
और सबसे बड़ी खता है ;
अपनी जगह ढूँढना ;
उनमें जो कभी तुम्हारे हो नहीं सकते ;
क्यूंकि अपनी मर्यादा ;अपने संस्कार ;
अपनी सरहदें ;अपने दायरे ;
तवज्जो देना दुनिया को ;
और एक अदद हमसफ़र ना होना ;
पास किसीके भी ;
इस ज़माने में ;बड़ी खता है |

सुना है मैंने की ,शब्दों में शक्ति होती है ,

सुना है मैंने की ,शब्दों में शक्ति होती है ,
वोह दुआएं ,किसी बीमार को नयी जिंदगी दे देती हैं ,
तो कहीं वोह प्रार्थना के स्वर ,
किसी को सब कुछ दिला देते हैं ,
और वोह आह निकली हुई किसी के मुह से ,
किसी का सब कुछ छीन लेती है ,
सुना है मैंने की शब्दों में शक्ति होती है,
 पर क्यूँ मेरी कोई उम्मीद पूरी ना हो सकी ,
क्यूँ मेरे शब्दों को तबज्जो न मिल सकी ,
जबकि मैंने चाहा था टूटकर तुमको ,
हर बार निकले जो अल्फाज मेरे मुह से ,
वो कहीं ना कहीं दिल की गहराइयों से निकले ,
अगर शब्दों में शक्ति होती है ,
तो क्यूँ मेरे शब्द तुम्हें मेरे पास रोक ना पाए ,
क्यूँ तुम मुझपर भरोसा न कर सके ,
और क्यूँ तुम दूर चले गए दूर मुझसे ,
पता नहीं कमी कहाँ थी मुझमे या मेरे शब्दों में ,
या जरुरत है मुझे भरोसा कर लेने की इस बात पे की मेरे शब्द निःशब्द से रह गए ,
बेअसर से क्यूंकि तुमने मुझे कभी सुना ही नहीं !


कोशिश हर बार की मैंने की कह दूं वोह सब जो दिल में है ,किसी से नफरत ,किसी से मोहब्बत ,किसी से अलगाव तो किसी से चाहत ,मगर वाह री दुनिया ,और एक निराला सा में ,जो बुरा बोला मुंह से उसे तो सबने सुना ,पर जो भला था मेरे अन्दर ,किसी ने झाँका भी नहीं ....................मेरी नफरत मेरी टीस मेरी कसमसाहट ,सब को दिख गयी बिना बोले ,और मेरे हँसते चेहरे के दर्द को किसी ने पढ़ा ही नहीं......................