मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................
रिश्तों का एक दरख्त ,बड़ा पुराना ,
सींचा हुआ खून और पसीने से ,
जाने क्या हुआ ,कैसे लगी बुरी सी नजर इस पर ,
की हर पत्ती टूटके डली है जमी पे ,
और शाख ठूंठ से सीधे खड़े हैं ,
सर उठाए ,कोशिश लाख कि फिर जी जाये ये ,
अकेला लड़ूँ कैसे ,अब जीना मुश्किल ,
और ढहते देखना अपनी बगिया के पेड़ को ,
सोचता हूँ ,मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................
दरख्त की हर शाख अब सूखी सूखी सी ,
हर पत्ता टूटके झरने को बेकरार ,
जड़ें कमजोर और मैं अकेली पत्ती ,
जूझती ,झुंझलाती ,द्वंद्व में फंसी हुई ,
जुड़ा रहूँ ,की छोड़ दूँ ,कैसे सब कुछ अच्छे की ओर मोड दूँ ,
पर बीमारी इतनी कि ,मुश्किल सा है ,
बच पाना मेरे दरख्त का ,
साथ खत्म होने का इंतेजार ,
या दरख्त को गिरता देखूँ ,
सोचता हूँ ,मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................
बस वो ही था ,जिसने दिखाये मौसम ,
पतझड़ ,सावन ,बसंत और बहार ,
बस वो ही था जो हिमालय सा खड़ा ,
हर समय सबको छाव देता था ,
आशियाने थे कितने परिंदों के उस पर ,
सब आए गए, हो गए ,
जब हरा था तो कितने राहगीर रुके इसके नीचे ,
पर अब अंत है इसका ,सब सूख गया है ,
पानी भी ,न लहू इसमें ,ये खाक में मिल जाएगा इक दिन ,
सोचता हूँ उम्मीद के सहारे रुक जाऊन थोड़ा सा ,
पर कभी सोचता हूँ ,मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................
उम्मीद लगाना मुश्किल ,
उम्मीद देना झूठ और प्रपंच सा ,
रोज उठता था तो वो सूरज इस दरख्त के चक्कर काटा करता था ,
कई बादल समंदर से उड़कर आते ,
और बरसकर के चले जाते ,नाचा करता था में भी हवा के झोंकों में ,
अब जलाता है सूरज हर रोज और भी ज्यादा ,
हवा के झोंके भी झकझोर के रख देते हैं ,
बारिश ने भी रुख मोड लिया अब ,कि लगता है डुबो के जान ले लेगी,
इतना दिन साथ दिया हमने एक दूजे का ,
सुख में संग तो दुख में भी ,
या फिर
सोचता हूँ ,मैं क्यूँ फना ना हो जाऊँ .............................