चाहत
नहीं जानता हूँ क्या खता की है मैंने ,
चाहा है चाँद को यह जानके भी की दाग है उस पर,
चाहा है चढ़ते सूरज को यह जानके भी की जल रहा है वो,
चाहा है नदी को यह जानके भी की वोह रुकती ही नहीं,
चाहा है समुन्दर को यह जानके भी की उसकी गहराई का कोई अंत ही नहीं,
चाहा है अपनी चाहत को यह जानके भी की कभी उसने हमें चाहा ही नहीं ,
आज भी परेशां हूँ मैं की क्या खता थी मेरी ,
यह की मैंने चाहत की,
या यह की सब जानके भी उसे चाह मैंने |
अमितोम कहाँ रोता है अब ,
रोए भी तोह कैसे ,
हर अश्क खो गया है उसका ,
आँखों पे आता कहाँ है ,
बहता रहता है हर सु ,
बदन में उसके लहू बनके |
No comments:
Post a Comment